धूप

यूँही इन्ही दिनों धूप में बैठे अलसाते हुए अचानक एक ख़याल सरक आया मन में..

अभी खिलना शुरू ही हुआ था..के बस रुक गया फिर ..

तो हमने सोचा चलो अधूरा ही लिखे देते हैं आज ..

तो ये है ..धूप ..अधूरी

chk out 🙂

————-

धूप ..वही की वही ..वैसी की वैसी

कहीं कपड़ों को सुखाती ..तो कहीं पसीने में तर कर जाती है धूप

कहीं ज़मीनों में दरारें खुरेद्ती ..

तो कहीं खुशहाल पापड़ और वड़ीयान सुखाती ये धूप

बेशुमार धूप ..

कहीं कोमल पत्ते पर सरकती ओस की बूँद में मुस्काती ..

तो कहीं काया को झुलसाती ये धूप

कहीं गुनगुनी सी ..बस हलकी सी गर्म ..अलसाती धूप

तो कहीं छाँव को तरसाती चिलचिलाती धुप ..

पर देखें तो ये धूप है क्या ..

बस किसी के होने का एहसास ..

सूर्य .. आदित्य ..इसका स्रोत

इस सब से ऊपर..इस सब से परे ..

जो बस है..

या वैज्ञानिक दृष्टि में देखें..तो होता जा रहा है..

धूप के खिलवाड़ से बेखबर ..

इसे न धूप से ऊब ..और नाही इसकी मालकियत की हूक

वो तो बस है..

..to be continued..may be..may be not.. बस 🙂

Published by

adityapathak

Please visit me at my homepage https://adityapathak.net/ for more info. Thanks and best wishes, Aditya

2 thoughts on “धूप”

  1. gungunaye kabhi; kabhi gussaye ye dhopp..
    kabhi haste chehre si lage kabhi rulaye ye dhoop…
    serdi mein bhini bhini germi maa k achal si bhaye ye dhoop…
    aur germi mein paseene nikal papa si mehnat kerni sikhaye ye dhoop..
    kabhi chilchila ke bhai se masti bhari jhik jhik a ehsaas karaye ye dhoopp..
    kabhi mere si chanchal,kabhi shrarati ho jaye ye dhopp..

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