I LOVE YOU – a dialogue within me !

“I love you”
One fine day I was feeling restless about this thought that ..why this sentence is so hard for me to say …
And this happens esp for the one I really love..otherwise while fooling around..flirting, playful chats etc, this sentence is easier to say ! why ?

I introspected a bit ..spoke to myself…penned the thoughts and it became little poetic..little dialogue-like.

Shared the same with a few close-associates who would relate with it , I feel. Then I thought there may be more such folks..so sharing it here 🙂

And ya.. its little eccentric … starts at something…moves to something else..and ends I dunno where..
..but having said that.. maen paagal nahi hun 🙂 u know it 😛

Feel free to reflect if u feel like..and pardon me for the spellings etc..typing in hindi is tough plz consider 🙂 cheers.

Good day !!
Aditya
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मैं प्रेम करता हूँ तुमसे ..
यह कहने जैसा होता है कभी कभी ..
पर कुछ है जो रोक लेता है भावों को शब्द बनने से पहले ही

झिझक नहीं है कोई , न कोई डर
और हो भी क्यों और किस से ?
तुम से ? नहीं पूरा प्रेम हूँ .. झिझक की जगह नहीं
ज़माने से ? स्वप्न -सुंदरी हो या डरावना एक सपना .. ये ज़माना है तो सपना ही ..
फिर क्यूँ रुक जाता हूँ मैं ..

सोचा एक दिन विश्लेषण करूँ ज़रा
“मैं प्रेम करता हूँ तुमसे ”
या कहिये .. “मैं क्रोध करता हूँ उस पे ”
या .. “मैं इर्श्या करता हूँ उन सब से ”
मैं .. वो .. और कुछ क्रिया -वाचक शब्दों का समूह …
बस यही तो है वो वाक्य जो कहना है ..
पर जाने क्या होता है .. मैं पर ही ठिठक जाता हूँ ..

मैं .. कौन ?
जो कुछ वर्षों पहले बिखरा था हवाओं में , फूल , फल , पत्तियों में ..
फिर शायद कई शरीरों से होता हुआ दो मनुष्यों के शरीरों में ..
और आज अपने ऊपर एक अपना शारीर पहने ..

मैं ..एक इंजिनियर .. एक कलाकार ..मैं कौन ?

मैं .. जो पूरी कोशिश कर सबसे आगे निकलना चाहता हूँ ..
या शायद औरों को पीछे करना ?

या मैं .. जो शायद कुछ और ही नए आयाम सीख ..
“सर्वाण आत्मवत पश्य ” (=सबको अपने जैसा देखो ) जीवन में उतारना चाहता हूँ ?

मैं .. जो बस निष्काम प्रेम से भर जाता हूँ तुम्हारे होने मात्र से ..
या मैं .. जिसे बस तुम्हारी ‘हाँ’ सुन नी है .. तुम्हें चाहे टूटना , झुकना , लूटना ही पड़े !!

या मैं …जो सर से पाँव तक प्यार ही प्यार हूँ ..
पर फिर भी उस “हाँ ” के बाद .. उस टूटे , झुके और लुटे हुए “तुम ” से ..
उस पुराने स्वच्छंद “तुम ” सा होने की उम्मीद रखता हूँ !

बस एक ‘मैं ‘ शब्द भी नहीं बोला अभी तो भाई ,
और इतना विरोधाभास खुद में ही .

अब आएं “प्रेम करता हूँ ” पर ..
या फिर “क्रोध करता हूँ ” .. “इर्श्या करता हूँ “.. कुछ भी मान लीजिये
प्रेम , क्रोध , इर्श्या ..ये सब तो भाव हैं न ? या क्रियाएं हैं ?
अब इन्हें किया कैसे जाए ? ये तो बस उठते हैं कहीं भीतर ..
और जितने उठते हैं ..उतना ही मैं घुलता जाता हूँ ..
चरम सीमा पर बस भाव रह जाता है ..मैं बिलकुल नहीं ..
या कहिये “मैं प्रेम हो गया हूँ “..
पर प्रेम “करता ” हूँ ..ये कैसे हो ?? कैसे कर डालूं ??
क्या आप “ख़ुशी ” कर सकते हैं ? दुःख कर सकते हैं ?
खुश या दुखी हो सकते हैं न !!

चलिए ..अब कहते हैं “मैं प्रेम हूँ “.. फिर ?? तो क्या ??
ये कोई सवाल या प्रस्ताव तो नहीं है ..के किसीके जवाब का इंतज़ार हो !
हूँ तो हूँ .. और पूरा हूँ .. अब इसे कहने चलूँगा तो बोलने का कृत्य करना होगा …
चित्त में थोड़ी जगह बनानी होगी ..थोडा प्रेम हटाकर कर्तापन लाना होगा ..
ये तो गड़बड़ है .. प्रेम से भरा हुआ भी होना है .. और इसे कहना भी है ? ये तो न हो पाएगा एक साथ !!

कुछ अजीब विचार लगते हैं ना !!
अब इंजीनियरिंग की पढाई कुछ तो side -effects छोड़ेगी ही !! फिलहाल ऐसा ही हूँ !! 🙂

फिर एक नया असमंजस !
बोल भी दूँ .. फिर आस लगाऊं के जवाब आएगा .. और वो भी ‘हाँ ‘..
कितना गलत लगता है ऐसा सोचना भी ..हिंसात्मक ..

अब हमारे वाक्य का आखरी शब्द .. “तुमसे “..
अब ख़याल आया “तुम ” का ..
लो .. ये कैसे मैं भूल रहा हूँ इस पूरे सन्दर्भ में ..
के तुम भी तो उतने ही अद्वितीय हो ..जितना मैं ..
तुम भी तो एक “मैं ” हो ..
तुम्हारी भी तो इतनी ही तीव्र जिज्ञासाएं और इच्छाएं हैं ..भाव हैं
तुम्हारा भी तो उतना ही एक अस्तित्व है जितना के मेरा ..
वो सब जो अपने लिया सोचता हूँ , महसूस करता हूँ ..
ज़ाहिर है के अगर तुमसे प्रेम है ..तो उतना ही तुम्हारे लिए भी सोचूँ ..
या शायद उस से भी ज़्यादा ..
अगर मैं प्रेम हूँ .. तो तुम्हारे होने से ही एक आनंद होना चाहिए भीतर ..
और तुम खुश हो जाओ किसी बात पे ..चाहे वो मैने न कही हो ..
तो भी मुझे और और प्रफुल्लित प्रेम हो जाना चाहिए !! नहीं ?
लीजिये ..असमंजसों के बीच ये एक खुद पे धिक्कार का भाव भी ..
सोने पे सुहागा 🙂

अब लगता है ..”वाक्य बनाओ ” का सवाल ..
इतना भी आसान नहीं होता बच्चों के स्कूल की परीक्षा में ..
या कहिये ..सबसे कठिन है शब्द देना एक भाव को .. अगर आप सचमुच सच्चे हैं ..और आपका भाव भी !

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adityapathak

Please visit me at my homepage https://adityapathak.net/ for more info. Thanks and best wishes, Aditya

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